श्री अशफ़ाक़ उल्ला खाँ – मैं मुसलमान तुम क़ाफ़िर

 

इस तरह की अपनी कुर्बानियों से  वतन  की  मिट्टी – पानी  का  कर्ज़  अदा  करने  वाले  सिरफिरे  मतवालों में श्री बिस्मिल के बाद अशफ़ाक़ उल्ला खाँ का ही नाम आता है । प्रस्तुत आत्मकथ्य में विशेष परिचय के उपखँड नाम से दिये परिशिष्ठ मे श्री बिस्मिल की चर्चा के बाद अशफ़ाक़ उल्ला खाँ साहब का परिचय जुड़ा दिखता है । अपने जीवनकाल में भी यह दोनों मित्रों ने एक नायाब दोस्ती की मिसाल कायम की थी । सँभवतः भाई  शिव  वर्मा  जी  ने  इसी कारण  मुख्य आरोपियों  की  परिचय श्रॄँखला  में  इन्हें  बिस्मिल  जी  के  बाद  दूसरा  स्थान  दिया  है । शहीद अशफ़ाक़ उल्ला को जीवनपर्यँन्त यह सवाल सता रहा और वह अपने सखा से यह पूछते रहते कि लोग आख़िर ऎसा क्यों सोचते ही हैं कि मैं

मालिक तेरी रजा रहे बाकी न मैं रहूँ न मेरी आरजू रहे

जहाँ  तक  मैं  समझता  हूँ  कि  पिछली सँदर्भित  कड़ी  सहित  परिचय श्रृँखला  की  यह  कड़ियाँ  सँभवतः  श्री भगवतीचरण वर्मा के कनिष्ठ भ्राता और बिस्मिल जी के अभिन्न मित्र श्री शिव वर्मा ने या क्राँति-दल के साथियों ने सामूहिक रूप से मिलजुल कर तैयार की होगी । यह तो सर्वविदित है कि बिस्मिल जी ने यह पाँडुलिपि जेल में उनकी माता के सँग आये हुये मित्र श्री शिव वर्मा को ही अपने बलिदान-दिवस से ठीक एक दिन पहले 18 दिसम्बर को सौंपी थी । श्री भगवतीचरण वर्मा द्वारा इसे पुस्तकाकार रूप  दिये  जाने  के  मध्य  ही  यह  परिचय  श्रृँखला  सम्मिलित  की  गयी  होगी । चूँकि यह पुस्तक अपने प्रकाशन  के  चौथे  दिन  ही  ज़ब्त  कर  ली  गयी  थी, इसलिये  कालाँतर  में  इससे  किसी  छेड़-छाड़  की सँभावना कम ही  दिखती… आगे पढ़िये

पुनरागमन बिस्मिल आत्मकथ्य- और इसके पहले

इससे पहले कि मैं आत्मकथा की कड़ियों का पुनःप्रकाशन आरँभ करूँ, मैं  देश  के  गौरव  अमर  हुतात्मा के सम्मुख क्षमादान माँगते हुये नतमस्तक हूँ । उस  समय  जबकि  इस  आत्मकथा का  प्रवाह अपने  अँतिम  चरण  में  था, इसका अनायास रुक जाना क्षम्य नहीं है । 25 अगस्त  2009 के बाद से आज तक इनका प्रकाशन बाधित रहा है, इस  अँतराल के बढ़ते जाने के साथ ही मैं अहर्निश एक अपराध बोध से ग्रसित रहता आया हूँ । कई कारण स्वयँ ही जुड़ते गये, साथ ही एक महत्वपूर्ण चीज जो मुझे निरँतर उद्वेलित करती रहती  उसे मैंनें इन कड़ियों के नियमित पाठक श्री अनुराग शर्मा से साझा किया है । अस्तु,उसे यहाँ दोहराना प्रसँगान्तर या कहिये कि प्रत्यारोप होगा । उसे इस मँच पर न रखते हुये… आगे पढ़िये

श्री रामप्रसाद बिस्मिल

अमर शहीद की अँतिम नोट से इस आत्मकथ्य का पटाक्षेप नहीं होता । इसके उपराँत एक लघुखण्ड ’ विशेष परिचय’ का है । इसमें काकोरी काँड के लगभग सभी पात्रों का परिचयात्मक वर्णन है । यह तो स्पष्ट है कि, श्री बिस्मिल जी ने इसे स्वयँ न लिखा होगा । मेरा अनुमान है कि, स्व० बिस्मिल के बलिदान के उपराँत यह खण्ड उनके मित्र श्री शिव वर्मा ने अपने अग्रज श्री भगवतीचरण वर्मा के सहयोग से इस पुस्तक के प्रकाशन से पूर्व लिखा होगा । वर्णित घटनाक्रम की जीवँतता को देखते हुये, ऎसा प्रतीत होता है  कि  बिस्मिल जी  के  दल  के  सँग  जुड़े किसी  अज्ञात  सहयोगी ने  भी  इसे  प्रस्तुत  करने  में  भरपूर मार्गदर्शन किया है ।  टिप्पणी निवेदन – डा. अमर कुमार

वो कवितायें, जो मुझे प्रिय रही हैं !

अब तक आपने पढ़ा.. “ वायसराय ने जब हम काकारी के मृत्युदण्ड वालों की दया प्रार्थना अस्वीकार की थी, उसी समय मैने श्रीयुत मोहनलाल जी को पत्र लिखा था कि हिन्दुस्तानी नेताओं को तथा हिन्दू-मुसलमानों को अग्रिम कांग्रेस पर एकत्रित हो हम लोगों की याद मनाना चाहिये । सरकार ने अ्शफाक उल्ला को रामप्रसाद का दाहिना हाथ करार दिया । अशफाकउल्ला कट्टर मुसलमान हो कर पक्के आर्यसमाजी और रामप्रसाद  के क्रान्तिकारी दल के सम्बन्ध में यदि दाहिना हाथ बन सकते है, तब क्या भारतवर्ष की स्वतन्त्रता के नाम पर हिन्दू मुसलमान अपने निजी छोटे-छोटे फायदों का ख्याल न करके आपस में एक नहीं हो सकते ? “  इसके आगे पढ़े…

प्रस्तुतिकर्ता टिप्पणी : आगे के साढ़े तीन पृष्ठ स्व० हुतात्मा अमर बिस्मिल जी ने अपनी… आगे पढ़िये

गये थे रोजा छोड़ने नमाज गले पड़ गई ।

अब तक आपने पढ़ा.. “ यह जानते हुए कि अंगेज सरकार कुछ भी न सुनेगी, मैंने सरकार को प्रतिज्ञा पत्र ही क्यों लिखा ? क्यों अपीलों पर अपीलें तथा दया प्रार्थनायें की ? इस प्रकार के प्रश्न उठते हैं, मेरी समझ में सदैव यही आया है कि राजनीति एक शतरंज के खेल के समान है । “  अब आगे..

शतरंज  के  खेलने  वाले  भली-भांति  जानते  है  कि  आवश्यकता  होने  पर  किस  प्रकार  अपने  मोहरे  भी मरवा  देना  पड़ते  है । बंगाल  आर्डिनेन्स  के  कैदियों  के  छोड़ने  या  उन  पर  खुली  अदालत  में  मुकदमा चलाने  के  प्रस्ताव  जब  एसेम्बली  में  पेश  किये  गये,  तो  सरकार   की   ओर   से   बड़े   जोरदार   शब्दों   में   कहा  गया   कि, सरकार  के   पास  सबूत   मौजूद   है । खुली   अदालत   में   अभियोग  चलाने   से   गवाहों … आगे पढ़िये

राजनीति एक शतरंज के खेल के समान है ।

अब तक आपने पढ़ा…  उनको  उचित  है कि अधिक से अधिक अंग्रेजी के दसवें दर्जें तक की योग्यता  प्राप्त करके किसी कला-कौ्शल के सीखने का प्रयत्न करें और  उस कला-कौशल द्वारा ही वह अपना जीवन व्यतीत करें ।  इसके आगे स्व० बिस्मिल लिखते हैं..

जो धनी मानी स्वदेश सेवार्थ बड़े-बड़े विद्यालयों तथा पाठशालाओं की स्थापना करते है, उनको उचित है कि विद्यापीठों के साथ-साथ उद्योगपीठ, शिल्पविद्यालय तथा कलाकौ्शल भवनों की स्थापना भी करें । इन विद्यालयों के विद्यार्थियों को नेतागीरी के लोभ से बचाया जावे । विद्यार्थियों का जीवन सादा हो और विचार उच्च हों । इन्हीं विद्यालयों में एक-एक उपदेशक विभाग भी हो, जिस में विद्यार्थी प्रचार करने का ढंग सीख सकें । जिन युवकों के हृदय में स्वदेश सेवा के भाव हो उनको कष्ट सहन करने… आगे पढ़िये

यह कैसा भारतवर्ष है

अब तक आपने पढ़ा …मैं इस समय इस परिणाम पर पहुंचा हूं कि यदि हम लोगों ने प्राणपण से जनता को शिक्षित बनाने में पूर्ण प्रयत्न किया होता, तो  हमारा  उद्योग  क्रान्तिकारी  आन्दोलन  से  कहीं  अधिक  लाभदायक होता, जिसका  परिणाम  स्थायी  होता । अति उत्तम होगा कि भारत की भावी सन्तान तथा नवयुवक वृन्द क्रान्तिकारी संगठन करने की अपेक्षा जनता की प्रवृत्ति को देश सेवा की ओर लगाने का प्रयत्न करें और श्रमजीवियों तथा कृ्षकों का संगठन कर के उन को जमींदारों तथा रईसों के अत्याचारों से बचावें ।अब इसके आगे..

भारतवर्ष के रईस तथा जमींदार सरकार के पक्षपाती है । मध्य श्रेणी के लोग किसी न किसी प्रकार इन्हीं तीनों के आश्रित हैं उन्हें भी इन्हीं के मुंह की ओर ताकना पड़ता है… आगे पढ़िये

अच्छा हुआ जो मैं गिरफतार हो गया और भागा नही

अब विचारने की बात यह कि भारतवर्षमें क्रान्तिकारी आन्दोलन के समर्थक कौन से साधन मौजूद है ?

 गत पृष्ठों में मैंने अपने अनुभवों का उल्लेख करके दिखला दिया है कि समिति के सदस्यों को उदर-पूर्ति तक के लिये कितना कष्ट उठाना पड़ा । प्राण-पण से चेष्टा करने पर भी असहयोग आन्दोलन के पश्चात कुछ थोड़े से ही गिने चुने युवक सँयुक्त प्रान्त में ऐसे मिल सके, जो क्रान्तिकारी आन्दोलन का समर्थन करके सहायता लेने को उद्यत हुये । इन गिने चुने व्यक्तियों में भी हार्दिक सहानुभूति रखने वाले, अपने जान पर खेल जाने वाले कितने थे उस का कथन ही क्या है ?

कैसी बड़ी-बड़ी आशायें बंधा कर इन व्यक्तियों को क्रान्तिकारी समिति का सदस्य बनाया गया था, और इस अवस्था में, जब कि असहयोगियों… आगे पढ़िये